आज की चित्रकला हम स्लोवाक नेशनल म्यूज़ियम – म्यूज़ियम ऑफ़ हिस्ट्री के सौजन्य से प्रस्तुत कर रहे हैं। यह कृति द चेक-स्लोवाक / स्लोवाक-चेक प्रदर्शनी में देखि जा सकती है, जो ब्रातिस्लावा स्थित स्लोवाक नेशनल म्यूज़ियम, तथा प्राग मैं स्थित नेशनल म्यूज़ियम की संयुक्त परियोजना है। इस प्रदर्शनी का आयोजन मध्य यूरोप में चेकोस्लोवाकिया (1918–1992) की स्थापना की शताब्दी के उपलक्ष्य में किया गया था।
यह प्रभावशाली तथा विशाल आकार का चित्र यान हाला द्वारा बनाया गया था। वे मूलतः चेक थे, किंतु उन्होंने अपना अधिकांश जीवन स्लोवाकिया में बिताया था। वर्ष 1923 में हाला ने वाज़शेक नामक स्लोवाक गाँव में, हाई टाट्रा पर्वतमाला की तलहटी में निवास किया। उनकी कलात्मक साधना का प्रमुख उद्देश्य इस विशिष्ट भूभाग तथा स्लोवाक लोकजीवन का ललित कलाओं के पारंपरिक माध्यमों से प्रलेखन करना था। उन्होंने चित्रांकन के क्षेत्र में भी योगदान दिया और बच्चों एवं युवाओं के लिए आधुनिक स्लोवाक चित्रांकनो के संस्थापकों में से एक बने। हाला नृवंशविज्ञान तथा वृत्तचित्र-निर्माण से भी जुड़े रहे। वे चेक समाचारपत्र लिदोवे नोविनी में निबंधों का योगदान भी करते थे।
इस शैली-चित्र का विषय गाँव के गिरजा(चर्च) से बाहर निकलती महिलाओं का एक संघटन है, जिसकी पृष्ठभूमि में टाट्रा पर्वतमाला की ग्रामीण क्षेत्र का दृश्य दिखाई देता है। ये महिलाएँ स्लोवाकिया के लिप्तोव क्षेत्र के वाज़शेक गाँव की पारंपरिक लोक परिधान पहने हुइ हैं, जो अपनी समृद्ध और रंग-बिरंगी अलंकरण शैली के लिए प्रसिद्ध है। आर्ट नुवो की अलंकृत शैली के तत्वों का इस्तेमाल यान हाला द्वारा किया गया- जैसे रंगों के विविध और सजीव प्रयोग के संकेत हमे दिखाई देते हैं, जो 1930 के दशक के प्रारंभिक वर्षों में उनकी कलाशैली की प्रमुख विशेषता थी।
हाला वाज़शेक का गांव और वहाँ के देहाती इलाके से अत्यंत मंत्रमुग्ध थे। उनकी कला में विशेष रूप से स्थानीय लोकसंस्कृति (रीति-रिवाज, वेशभूषा, लोककथाएँ और लोकगीत) के प्रति उनका आकर्षण स्पष्ट रूप से झलकता है।
वाज़शेक ने स्लोवाक और चेक स्थानीय संस्कृति में शामिल अनेक अन्य विभूतियों को भी प्रेरित किया, जिनमें यान कोल्लार, ओन्द्रेय हलासा, कारेल प्लिका और पावोल सोकांच प्रमुख हैं। हाला के अतिरिक्त चित्रकार यारोस्लाव आगुस्टा तथा फ्रांटीशेक हव्रानीक भी वाज़शेक में बस गए।
— मार्टिना विस्कपोवा