गेहूँ के गुच्छे और उभरते चाँद का परिदृश्य by विन्सेंट वैन गो - 1889 - 72 x 91.3 से. मी. गेहूँ के गुच्छे और उभरते चाँद का परिदृश्य by विन्सेंट वैन गो - 1889 - 72 x 91.3 से. मी.

गेहूँ के गुच्छे और उभरते चाँद का परिदृश्य

कैनवास पर तेल • 72 x 91.3 से. मी.

  • विन्सेंट वैन गो - ३० मार्च १८५३ - २९ जुलाई १८९० विन्सेंट वैन गो

    1889

एक समय वैन गो, रात के आकाश को चित्रित करने के विचार से बेहद आकर्षित थे। उन्हें अपने पसंदीदा लेखक वॉल्ट विटमैन से प्रेरणा मिली, जिन्होंने तारों को अनंतता का प्रतीक माना, और थॉमस कार्लाइल जिन्होंने सितारों को ब्रह्मांड के रहस्य का राज़ बताया। वैन गो भी अपने चित्र में वही गहराई और व्यक्तिगत भावना का प्रयोग करना चाहते थे। 

इस चित्र में चाँद अल्पाइल पहाड़ियों के ऊपर उभरता नज़र आता है, जिसकी रोशनी सामने रखी गेहूँ के गुच्छे पर पड़ रही है। वैन गो ने इस चित्र पर बहुत मेहनत की, और आख़िरी चरण में उन्होंने इसपे हल्के बैंगनी रंग की रेखाएँ बनाई ताकि रात की रोशनी का एहसास और निखर कर आ सके। समय के चलते यह रंग फीके पड़ गए जिससे अब चित्र में सफेद रेखाएँ दिखती हैं जिस करण इसमें रात का माहौल घट गया। 

हालांकि वैन गो आम तौर पर प्रकृति में शामिल, सामने बैठकर चित्र बनाने में विश्वास रखते थे, लेकिन यह कृति उन्होंने ज़्यादातर अपने स्टूडियो में बनाई। अपने संक्षिप्त सहयोग के दौरान वशिष्ट चित्रकार और उनके मित्र पॉल गगुईन ने उन्हें अपनी कल्पना और याददाश से चित्र बनाने का प्रोत्साहन दिया। इसके बावजूद वैन गो परिणामों से नाखुश रहे: उनके अनुसार उस रचना में ज़रूरत से अधिक काम और शैली अतिरंजित लगती है। उन्होंने अफ़सोस जताया कि इसमें "गहराई से महसूस की गई रेखाएँ" नहीं है। 

आज पूर्णुमा का चाँद देखना न भूलें !

पुनश्च - हमारे नए पोस्टकार्ड सेट, लैंडस्केप्स में आपको इस चित्र जैसे और भी मोहक नज़ारे देखने को मिलेंगे। :)

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