"मुझे स्वतंत्र होना ही होगा; मुझे ख़ुद पर लगी सभी पाबंदियों को तोड़ना होगा। मुझे ख़ुद की क़ाबिलियत पर विश्वास है और इस काम से मुझे प्यार है। अगर मेरे रास्ते कोई अड़चने आईं तो मैं उन्हें दरकिनार कर दूँगी। और फिर क्या? अब मैं स्वतंत्र हूँ; मैं किसी भी दूसरे मनुष्य जितनी ही ख़ुश हूँ..." यह थे पोलिश चित्रकार आन्ना बिलिंस्का के कुछ शब्द।
बिलिंस्का उन महिलाओं की पीढ़ी का हिस्सा थीं, जिन्होंने कला की औपचारिक शिक्षा पाने के लिए उस समय बहुत संघर्ष किया, जब यूरोप की कई कला आकादमी में महिलाओं को सम्पूर्ण रूप से दाखिला नहीं मिलता था। अन्य समकालीन महिला कलाकारों की तरह, उन्हें भी विदेश जाकर पढ़ाई करनी पड़ी; उन्होंने म्यूनिक और पेरिस में कला की शिक्षा ली। वहाँ कम से कम महिलाओं का निजी चित्रालय में दाखिला संभव था जो उनके घर पोलैंड में संभव नहीं था। बिलिंस्का ने खास तौर पर पोर्ट्रेट चित्र और दैनिक जीवन चित्रण बनाने में पहचान बनाई। उनके चित्रों में 19वी सदी के आखिरी दौर के अकादमिक यथार्थवाद की झलक दिखती है, जिसमे ढीले और तान वाले ब्रश स्ट्रोक का ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया जाता है।
उनका अधूरा सेल्फ-पोर्ट्रेट उनकी सबसे शांतिपूर्ण भावनात्मक रूप से प्रभावशाली कृतियों में से एक है। यह प्रक्रिया बीच कैनवास में ही रुक जाति है; चेहरे और कपड़ो के हिस्से पूरी बारीकी से बनाए गए हैं, जबकि अन्य हिस्से कच्चे स्केच जैसे ढाँचे में अपूर्ण नज़र आते हैं, नीचे बनाई गई शुरुआती रेखाएँ साफ़ दिखाई देती हैं और चित्रों को बनाने की उनकी प्रक्रिया को दर्शाती हैं। यह कोई कलात्मक शैली नहीं थी, बल्कि चित्र बनाने की प्रक्रिया बस वहाँ आकर रुक गई। 1892 में केवल 35 साल की उम्र में बिलिंस्का की मृत्यु हो गई, और यह पोर्ट्रेट हमेशा के लिए अधूरा रह गया।
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