हिशिदा शुनसो उन चुनिंदा कलाकारों में से एक थे जिन्होंने 19वी सदी के आख़िरी दौर में, पारंपरिक जापानी चित्रकला को एक ऐसे समय में पुनर्जीवित किया जब पश्चिमी संस्कृति का असर जापान पर तेज़ी से बढ़ रहा था। बचपन से ही प्रतिभावान, उन्होंने 1890 में नव स्थापित टोक्यो फाइन आर्ट्स स्कूल में दाखिला लिया। वहाँ उन्होंने, योकोयामा ताईकान और शिमोमुरा कांजान जैसे कलाकारों के समक्ष पढ़ाई की। उन सभी ने साथ में मिलकर जापानी चित्रकला को विकसाने के नए तरीके खोजे, जहाँ उन्होंने मजबूत आउटलाइन पर निर्भरता की बजाय रंगों के हल्के परिवर्तन और माहौल पर परीक्षण किया।
एक नई कलात्मक भाषा की खोज उन्हें विदेश ले गई। शुनसो 1903 में भारत गए और बाद में 1904 और 1905 के बीच अमरीका और यूरोप भी, जहाँ वह नए कलात्मक विचारों से मिलते रहे परंतु इसके बावजूद अपनी जापानी परंपराओं से जुड़े रहे। दुर्भाग्यवश उनका कार्यकाल गंभीर दृष्टि समस्याओं के कारण आशा से पहले संक्षिप्त हो गया। उसके चलते 1911 में छत्तीस साल की आयु में अपनी मृत्यु से पहले वह नेत्रहीन हो चुके थे। उनकी मृत्यु पर उनके साथी कलाकारों ने गहरा शोक जताया; ताईकान ने बाद में कहा कि शुनसो की कला अनोखी थी और अगर वह ज़्यादा समय जीवित रहते, तो जापानी कला एवं स्वयं ताईकान का काम शुनसो की उपस्थिति से संपन्न हो जाता।
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Hishida Shunsō