काम पर जाते हुए by Jean-François Millet - 1851–1853 - 55.9 x 45.7 से.मी. काम पर जाते हुए by Jean-François Millet - 1851–1853 - 55.9 x 45.7 से.मी.

काम पर जाते हुए

कैनवास पर तेल • 55.9 x 45.7 से.मी.

  • Jean-François Millet - October 4, 1814 - January 20, 1875 Jean-François Millet

    1851–1853

आज सोमवार है, तो समय आ गया है इसके युक्त एक चित्र का। 

फ्रांस के ग्रूशि में, किसानों के घर जन्मे जीन-फ़्रांकुआ मिले, अपने आप को "किसानों का चित्रकार" बुलाते थे। 1837 में, इतिहास चित्रकार, पॉल डेलारोशे के अंतर्गत शिक्षित होते समय, उनकी मुलाक़ात थियोडोर रूसो से हुई, जो उनके साथी छात्र थे और जो आगे चलकर बर्बिज़ोंन स्कूल के प्रमुख व्यक्ति भी रहे। पेरिस के दक्षिण-पूर्व में फ़ोंटेनब्ल्यू के अरण्य के बीचों-बीच रहकर, इन कलाकारों ने प्रकृति और ग्रामीण जीवन को प्रत्यक्ष अवलोकन के माध्यम से चित्रित करने का प्रयास किया, जो स्थापित शैक्षणिक परंपरा को चुनौती देता था। इसी दृष्टिकोण का साझा करते हुए मिले, 1849 में स्थायी रूप से बर्बिज़ोंन मे बस गए। जहाँ उनके साथी कलाकार परिदृश्य चित्रित करने में व्यस्त थे, वहीं उन्होंने ख़ुद को ग्रामीण जीवन के दृश्य बनाने में समर्पित कर दिया और किसानो एवं श्रमिकों को रोज़मर्रा के कार्यों में व्यस्त दिखाया। 

मिले ने यह चित्र गोइंग टू वर्क  यानी काम पर जाते हुए, 1851 में चित्रित किया जब वह पोर्ट्रेट चित्रकला और शैक्षणिक नग्न कला से हटकर पूरी तरह ग्रामीण इलाकों के प्राकृतिक चित्रण की ओर मुड़ गए। हालांकि उनकी रचनाओं में मानव आकृतियाँ प्रमुख थीं, परंतु वह अक्सर जानबूझकर सामान्यीकृत ढंग से चित्रित थे। किसी विशिष्ट व्यक्ति को चित्रित करने की बजाय, मिले का उद्देश्य व्यापक मानव स्तिथि और धरती के प्रति मानवता के स्थायी संबंध को व्यक्त करना था। यद्यपि कुछ आलोचकों ने उनकी सरलीकृत शैली की आलोचना करी, उनकी कृतियों में एक ऐसी गरिमा और भव्यता का भाव है जो इन चिंताओं से परे है। 

पुनश्च - जीन-फ़्रांकुआ मिले एक ऐसे चित्रकार थे जो पूरी सुबह खेत जोत सकते थे, दोपहर में चित्र बना सकते थे और रात में शेक्सपियर का पाठ कर सकते थे। जीन-फ़्रांकुआ मिले—किसानों के चित्रकार को और गहराई से जानिए!