पक्षी के सफेद गर्दन के पंख, बैंगनी धारियों वाले पंख और लाल चोंच इसकी पहचान ऊनी गर्दन वाले सारस (सिकोनिया एपिस्कोपस) के रूप में कराते हैं। लगभग 1780 में लखनऊ(भारत), में बनाई गई यह कृति उस असाधारण काल से संबंधित है, जब मुगल परंपरा में प्रशिक्षित भारतीय कलाकारों ने यूरोपीय संरक्षकों के लिए प्राकृतिक इतिहास से जुड़े चित्र बनाना शुरू किया था। इन चित्रों में मुगल कला के सूक्ष्म अवलोकन और परिष्कृत तकनीक को परिप्रेक्ष्य, आयतन और भूदृश्य के यूरोपीय दृष्टिकोण के साथ जोड़ा गया था। इस चित्र में विशाल पक्षी एक लघु भूदृश्य पर छाया हुआ है, जबकि घुमावदार जलधारा संभवतः उन नदी-तटीय आवासों का आभास कराती है, जहाँ यह प्रजाति पाई जाती थी।
यह चित्र संभवतः फ्रांसीसी मूल के सैनिक, संग्रहकर्ता और शौकिया वैज्ञानिक क्लॉड मार्टिन द्वारा आरंभ की गई एक महत्त्वाकांक्षी प्राकृतिक-इतिहास परियोजना का हिस्सा था। मार्टिन लखनऊ के नवाब आसफ़-उद-दौला के लिए कार्य करते थे। मार्टिन ने भारतीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के सैकड़ों अध्ययन-चित्र बनवाए थे। अभिलेखों के अनुसार, इनमें कम-से-कम 658 पक्षियों, 600 पौधों तथा 606 सरीसृपों और अन्य जीवों के चित्र शामिल थे। इस प्रकार, यह परियोजना भारत के प्राकृतिक संसार को चित्रों के माध्यम से सूचीबद्ध करने के शुरुआती और व्यापक यूरोपीय प्रयासों में से एक बन गई। संभवतः इन चित्रों की कुछ प्रेरणा उस समय के यूरोपीय प्राकृतिक-इतिहास प्रकाशनों से मिली थी, लेकिन इन्हें भारतीय कलाकारों ने बनाया था और उनकी असाधारण सूक्ष्मता ने इन चित्रों को एक विशिष्ट पहचान प्रदान की। आज ऐसी कृतियों को उस चित्रकला शैली से जोड़ा जाता है, जो बाद में कंपनी शैली की चित्रकला के नाम से प्रसिद्ध हुई।
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