फ़्रैंकुआ-फ्लोरी रिचर्ड (1777-1852), लियों शहर के एक चित्रकार थे और जैक लुई डेविड के शिष्य भी थे। उन्होंने अपनी शुरुवात शैक्षणिक शैली में पोट्रेट और ऐतिहासिक दृश्य बनाकर करी। वैलेंटाइन ऑफ़ मिलान की यह कृति उनकी मशहूर कृतियों में से एक मानी जाति है, जिसने उनके करियर को एक नया मोड़ दिया। इस चित्र के ज़रिए उन्होंने त्रुबाडोर नाम की एक नई शैली को जन्म दिया।
यह पेंटिंग 1802 के सैलॉन में प्रदर्शित की गई थी और इसे तुरंत ही काफी सराहना मिली, शायद इसलिए क्योंकि इसमें एक ऐतिहासिक शख्सियत को बेहद निजी और भावनात्मक पल में दिखाया गया है। कैनवास का आकार छोटा होने की वजह से इस चित्र के आत्मीयता भावना को और भी गहराई मिलती है, कैनवास का यह छोटा आकार आम तौर पर ऐतिहासिक रचनाओं के लिए औपचारिक नहीं था। इस चित्र में वैलेंटाइन ऑफ़ मिलान को बेहद दुख की स्तिथि में दिखाया गया है, जो अपने पति ऑरलियों के ड्यूक का शोख़ मना रहीं थी, जिनकी मृत्यु 1407 में जॉन साँ प्योर के हाथों हुई थी। इस चित्र की प्रेरणा वैलेंटाइन के मकबरे और उस पर लिखे शब्दों से ली गई है: “मेरे पास अब कुछ नहीं बचा, मैं खुद कुछ नहीं रही।
दर्शक को निश्चित तौर पे उस महिला के दर्द का एहसास होता है, शायद इसलिए कि फ़्रैंकुआ-फ्लोरी ने यह रचना एक निजी संबंध के टूटने के बाद बनाई। मध्यकालीन इतिहास का अध्ययन करने वाले इस चित्रकार ने वैलेंटाइन को एक गॉथिक अभ्यंतर में चित्रित किया है। दर्शकों और समीक्षकों ने इस चित्र की बहुत प्रशंसा करी खास कर चियारोस्क्यूरो इफ़ेक्ट की और पर्दे के उज्जवल हरे रंग की, जो रोशनी को औढ़ कर एक रहस्यमय एहसास देता है।
वैलेंटाइन ऑफ़ मिलान के अच्छे गुणों की तारीफ़ कई कवियों ने की है, जिनमे यूस्टाश डेस्चॉंप भी शामिल हैं। इस चित्र में वैलेंटाइन एक ग्रेहाउंड कुत्ते को छूँ रही हैं, जो मध्यकालीन समय में, पति के प्रति वफ़ादारी और निष्ठा का प्रतीक माना जाता था।
टोनी गोपिल