आज हम आपके लिए एक खास और अनोखी किताब का एक पन्ना लेकर आए हैं। 15वी सदी के अंत की यह पांडुलिपि, चित्रित कहावतों और मुहावरों के एक संग्रह का जीवित उदाहरण है। हर एक चित्र के साथ जुड़ा एक पद्य होता है जो एक जाने-माने मुहावरे की ओर इशारा करता है। आम तौर पर, पद्य में मुहावरा सीधी तरह लिखित रूप में नज़र नहीं आता है, बल्कि चित्र और लेख दोनो के मेल से एक पहेली बन कर सामने आता है, जिसे परख कर पाठक के मन में वह मुहावरा अपने आप आ जाता है (इस सूचीपत्र में मौजूद चित्रों के शीर्षक ही स्वयं मुहावरे हैं)। यह मुहावरे मजेदार होने के साथ साथ नैतिक उपदेश भी देते हैं, यह अक्सर धार्मिक जीवन, खेती, व्यापार और औपचारिक एवं अनौपचारिक व्यवहार की बात करते हैं। इस पांडुलिपि में दरअसल और भी पन्ने थे परंतु या तो वह समय के चलते खो गए या फिर दोबारा बाइंडिंग के दौरान शामिल नहीं किए गए।
आज जो पन्ना हम प्रस्तुत कर रहे हैं वह यह मुहावरा दर्शाता है: "ऐसी बिल्ली बिना दस्तानों के पकड़ में नहीं आती है"। इस चित्र में हम एक आदमी को देख सकते हैं जो बड़ी ही सावधानी से उस बिल्ली की ओर आगे बढ़ता है, जिसके चेहरे और नोकीले पंजों को देख मालूम पड़ता है की इच्छा और आज्ञा की एक लड़ाई होनी तय है। यह चित्र, जो हर उस इंसान की भावना को कैद करता है जिसने जीवन में कभी ना कभी विमुख बिल्ली को पकड़ने की कोशिश करी है, दरअसल यह संदेश देता है कि कुछ चीज़ें बिना संघर्ष के हासिल नहीं होती हैं।
आज की हमारे इस पेशकश का श्रेय जाता है बाल्टीमोर के वाल्टर्स आर्ट म्यूजियम को, जो हमारे मार्जारीय साथियों का उत्सव मना रहा है एक शानदार प्रदर्शनी में, जिसका नाम है पॉस ऑन पार्चमेंट यानी चर्मपत्र पर पंजे। :)
पुनश्च - बिल्लियों से लेकर मगरमछ और साही तक—मध्यकालीन पांडुलिपियों में विभिन्न प्रकार के जानवर छुपे हैं। इन सुंदर जानवरों की सराहना करे, हमारे एनिमल्स 50 पोस्टकार्ड्स सेट में— जहाँ कला इतिहास से 50 ऐसी कृतियाँ हैं जिनमे जंगली, अद्भुत और शानदार जानवर शामिल हैं। यह दूसरो के चेहरे पर मुस्कुराहट लाने के लिए या फिर अपने संग्रहण में जोड़ने के लिए उचित है।