आज का चित्र पेश है नेशनल म्यूज़ियम ऑफ़ वीमेन इन द आर्ट्स की तरफ़ से। :) आनंद लीजिए!
हॉलिस सिग्लर ने हमेशा महिलाओं से जुड़े विषयों जैसे प्रेम, परिवार और घरेलू जीवन को अपना चाहिता विषय माना। उन्होंने कई चित्रों में घरों के आंतरिक भागों, आँगन या छुट्टियों के गुप्त स्थानों को चित्रित किया, जहाँ घरेलू वस्तुएँ या एक छाया से आकार का उपयोग असली लोगों की जगह किया गया जिनको उन्होंने 'लेडी' का नाम दिया। अपने करियर के आखरी 15 वर्षों में सिग्लर ने ब्रेस्ट कैंसर के विषय पर ज़ोर दिया, जिससे वह ख़ुद झूझ रहीं थी। 2001 में 53 साल की उमर में उनकी मृत्यु इसी बीमारी के चलते हुई। हो सकता है कि यह चित्र सिग्लर की वह उम्मीद की किरण हो जहाँ जीवन के शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक सफ़र एक हो जाते हैं। जैसे की कोई आकृति (या आकृतियाँ) दिव्य रोशनी में आवृत एक सीडी पे चढ़ रही है और उनकी उठी हुई बाहें पंखों में बदलती नज़र आती हैं।
सिग्लर ने नैव कला को अपनी शैली के तौर पे चुना (जो स्वयं प्रशिक्षित कलाकारों द्वारा अपनाए गए अप्रशिक्षित दृष्टिकोण को दर्शाता है)। उन्होंने इस शैली को इसलिए चुना ताकि दर्शक चित्रों के भावनात्मक पहलुओं से जुड़ सकें। सिग्लर के कई चित्र कैंसर के इर्द गिर्द होते हैं, जहाँ आंकड़े, इलाज, डर, गुस्सा और बीमारी से जुड़े अनिश्चितता को दर्शाया गया है। टू किस द स्पिरिट्स एक काव्यात्मक और प्रेरक परिकल्पना को दर्शाती है, जहाँ एक महिला को अंततः शांति और मुक्ति मिल गई है।