मध्यकालीन यूरोप में धर्माध्यक्ष, मठाधीश एवं मठाधीशा अपने उच्च धार्मिक पद के प्रतीकस्वरूप विशिष्ट वस्त्र पहनते थे और विशेष चिह्न धारण करते थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से था एक दण्ड- क्रोज़ियर।
क्रोज़ियर अक्सर शरीर जितने लंबे या उससे भी बड़े होते थे, और उन्का मुड़ा हुआ, और कई बार अत्यंत अलंकृत शीर्ष से भाग किया जाता था। फ़्रांसिसि निर्मित यह कृति दर्शाती है कि दैनिक उपयोग में आने वाली ऐसी छोटी-सी वस्तुएँ भी अपने आप में असाधारण कलाकृतियाँ थीं।
यह क्रोज़ियर दोनों ओर से अलंकृत है; इसकी दूसरी ओर मसीह को क्रोस पर चढ़ाए जाने का दृश्य अंकित है। इस ओर, जहाँ कुँवारी मरियम शिशु मसीह को गोद में थामे हुए हैं, इस कृति के संभावित स्वामी के बारे में कुछ व्यक्तिगत संकेत मिलते हैं। वर्जिन मरियम के बाईं ओर प्रार्थना में घुटने टेककर बैठा एक मठाधीश दिखाई देता है, जबकि दाईं ओर बिशप के वस्त्र पहने एक शिरोविहीन आकृति अपने हाथों में अपना माइटरधारी सिर थामे हुए है।
इन आकृतियों को साथ देखकर विद्वानों का मानना है कि यह क्रोज़ियर चौदहवीं शताब्दी में पेरिस के उत्तर में स्थित सेंट डेनिं के मठवासी समुदाय के एक मठाधीश के लिए बनाया गया था। फ़्रांसीसी राजतंत्र के संरक्षक संत और शहीद मठाधीश के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्होंने अपने वध-स्थल से अपना सिर स्वयं उठाकर हाथों में लिया और जिस स्थान पर आगे चलकर उनका तीर्थस्थल तथा मठ स्थापित हुआ, वहाँ पहुँचने तक उपदेश देते रहे।
हलाकि विद्वान निश्चित रूप से नहीं जानते कि इस क्रोज़ियर का उपयोग किस मठाधीश ने किया, इतना स्पष्ट है कि वह न केवल अत्यंत संपन्न व्यक्ति था, बल्कि कला का संरक्षक भी था।
क्रोज़ियर अत्यंत व्यक्तिगत वस्तुएँ होते थे और अक्सर उनके स्वामियों की रुचियों तथा आस्थाओं को प्रतिबिंबित करने के लिए बनाए जाते थे। इस कृति की चित्रात्मक सज्जा से यह संकेत मिलता है कि संबंधित मठाधीश अपने मठ के नेता और मार्गदर्शक के रूप में अपनी भूमिका को अत्यंत गंभीरता से निभाता थे। इस प्रकार यह कृति हमें उनके व्यक्तित्व, जीवन और पद का एक उल्लेखनीय स्मरण कराती है।
– स्टेफ़नी स्केन्यन